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प्रकृति ने अपना क्रोध है दिखाया

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प्रकृति ने अपना क्रोध है दिखाया,

रेगिस्तान में भी जल का सैलाब आया |


जल का सम्मान है आज जरूरी,
जल को व्यर्थ बहाने की न हो मजबूरी,
जल और मनुष्य में न हो कोई दूरी,
जल के बिना जीवन की कल्पना अधूरी,
जल ने भयंकर रूप ले बाढ़ बनकर दिखाया,
रेगिस्तान में भी जल का सैलाब आया |


जल का यदि होगा अपमान,
मुश्किल होगी बचानी हमको जान,
जल की कमी से न उगेगा धान,
अति वृष्टि से भी दुखी होगा इंसान,
कहीं सूखे, कहीं बाढ़ ने किसान को रुलाया,
रेगिस्तान में भी जल का सैलाब आया |


महाराष्ट्र में सूखा तो राजस्थान में बाढ़ बनकर आया,
देश ही नहीं, पूरे विश्व में जल ने हाहाकार मचाया,
यूरोप से मुँह मोड़ा और सूखे से उसे सताया,

अमेरिका, चीन आदि देशों में तूफ़ान बन कहर ढाया,
बाढ़, तूफ़ान, सुनामी के रूपों में अपना क्रोध दिखाया,
रेगिस्तान में जल भी का सैलाब आया |


हमारी संस्कृति ने जल को सम्माननीय माना,
पर हमने जल की शक्ति को नहीं जाना,
प्रदूषण फैला, बाँधों में रोक, किया मनमाना,
स्वार्थ का हर समय गाते रहे गाना ,
विकराल रूप से जल ने मानव को चेताया,
रेगिस्तान में भी जल का सैलाब आया


Nature protects if she is protected.

Love Nature,     respect nature.

.



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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अजय यादव के द्वारा
September 1, 2012

सुंदर रचना बहुत खूब |

    Punita Jain के द्वारा
    September 1, 2012

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद |

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 29, 2012

हमारी संस्कृति ने जल को सम्माननीय माना, पर हमने जल की शक्ति को नहीं जाना, प्रदूषण फैला, बाँधों में रोक, किया मनमाना, विकास का हर समय गाते रहे गाना , विकराल रूप से जल ने मानव को चेताया, रेगिस्तान में भी जल का सैलाब आया आदरणीया पुनीता जी, सादर अभिवादन जल की हम आपको चिंता जल ही है जीवन. बधाई.

    Punita Jain के द्वारा
    September 1, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी , आपने सही कहा– जल है तो जीवन है, इसलिए जीवन के समान जल की चिंता करनी भी जरुरी है | उत्साहवर्धन के लिए आपका हार्दिक आभार |

dineshaastik के द्वारा
August 28, 2012

आदरणीय पुनीता जी सादर नमस्कार। पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूप करती एवं सुन्दर संदेश देती हुई, काव्यात्मक प्रस्तुति के लिये अधिकाधिक बधाई, स्वीकृत करें।

    Punita Jain के द्वारा
    September 1, 2012

    आदरणीय दिनेश जी, उत्साह बढ़ाती आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा आगे लिखने के लिए प्रेरणा देती हैं | आपका बहुत बहुत धन्यवाद |

yogi sarswat के द्वारा
August 28, 2012

हमारी संस्कृति ने जल को सम्माननीय माना, पर हमने जल की शक्ति को नहीं जाना, प्रदूषण फैला, बाँधों में रोक, किया मनमाना, विकास का हर समय गाते रहे गाना , विकराल रूप से जल ने मानव को चेताया, रेगिस्तान में भी जल का सैलाब आया समसामयिक विषय पर आपके स्पष्ट शब्द सार्थक लगते हैं पुनीता जी ! सम्मान सहित आपको अपने पोस्ट पर आमंत्रित करना चाहता हूँ ! समय मिले तो आयें ! http://yogensaraswat.jagranjunction.com/2012/07/23/इन-मासूमों-का-क्या-दोष

    Punita Jain के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय योगी जी, उत्साह बढाती सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार |

Mohinder Kumar के द्वारा
August 28, 2012

पुनीता जी, पर्यावरण को हल्के में लेने का नतीजा हमें बहुत कुछ दे कर चुकाना पड सकता है. धरोहरों को सहेजना होगा ताकि आने वाली पीढी का जीवन सुखमय हो. सार्थक रचना के लिये आभार.

    Punita Jain के द्वारा
    August 28, 2012

    आदरणीय मोहिन्दर जी, आप बिलकुल सही कह रहे हैं – “धरोहरों को सहेजना होगा ताकि आने वाली पीढी का जीवन सुखमय हो” सुन्दर विचारों के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद |

akraktale के द्वारा
August 26, 2012

जल बचाने के लिए संदेश देती या चेतावनी देती सुन्दर कविता. हमारी संस्कृति ने जल को सम्मानीय माना, सम्माननीय नहीं जीवन माना है. बधाई आपको पुनीता जी.

    Punita Jain के द्वारा
    August 26, 2012

    आदरणीय अशोक जी, प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद |

vikramjitsingh के द्वारा
August 26, 2012

प्रकृति से इंसान की नाजायज़ छेड़छाड़ ही इस सबका कारण है……. सुन्दर शब्द-सुन्दर भाव…. सादर….पुनीता जी…..

    Punita Jain के द्वारा
    August 26, 2012

    आदरणीय विक्रमजीत जी, उत्साह बढाती प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत बहुत आभार |

jlsingh के द्वारा
August 26, 2012

पुनीता जी, नमस्कार! दुनिया उलट पलट गयी है, फ्रांस और जर्मनी में गर्मी और राजस्थान के रेगिस्तान में सैलाब. हर तरफ है आब ही आब दिल्ली भी नहीं है दूर, हम सब हैं मजबूर! हमने छेड़ा प्रकृति को, प्रकृति अब छेड़ रही है. अब जाएँ तो जाएँ कहाँ हमें वह चारो तरफ से घेर रही है!

    Punita Jain के द्वारा
    August 26, 2012

    आदरणीय जवाहर भाई, “हमने छेड़ा प्रकृति को, प्रकृति अब छेड़ रही है. अब जाएँ तो जाएँ कहाँ हमें वह चारो तरफ से घेर रही है!” —— बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ, हार्दिक धन्यवाद |

meenakshi के द्वारा
August 25, 2012

पुनीता जी , अच्छी रचना..है. बधाई स्वीकार करें. मीनाक्षी श्रीवास्तव

    Punita Jain के द्वारा
    August 25, 2012

    मीनाक्षी जी, आपको रचना अच्छी लगी, इसके लिए आपका हार्दिक धन्यवाद |

nishamittal के द्वारा
August 25, 2012

पर्यावरण से अनावश्यक छेड़ छाड के दुष्परिणामों को सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है आपने

    Punita Jain के द्वारा
    August 25, 2012

    आदरणीय निशा जी, उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार |


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