Contemporary Thoughts

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Punita Jain


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मच्छर बोला आदमी से

Posted On: 15 Dec, 2013  
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Others कविता मस्ती मालगाड़ी मेट्रो लाइफ में

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जीवन के दो हैं किनारे

Posted On: 27 Jul, 2013  
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Others कविता में

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पतझड़ का मौसम

Posted On: 31 Mar, 2013  
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Others में

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मानसून अब आ भी जाओ

Posted On: 27 Jun, 2012  
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Others न्यूज़ बर्थ मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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दुख के काँटे (कविता)

Posted On: 19 May, 2012  
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Others मेट्रो लाइफ में

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: Punita Jain Punita Jain

के द्वारा: Priyanshu Sharma Priyanshu Sharma

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

माननीया पुनीता जी ! सच तो यह है की इस पूरी समस्या की जड़ स्वयं नारी ही है ! बाल्यावस्था में बच्चे को प्रारंभिक संस्कार माँ से ही मिलते हैं माँ से अच्छा गुरु कोई हो ही नहीं सकता ! अच्छे-बुरे का भेद यदि संस्कारों में मिले तो किसी हद तक समस्या का निदान स्वतः संभव है ! सास-बहू के द्वन्द / ननद-देवरानी की नोक-झोंक /मन-मुटाव ,कलह ये घर-घर की कहानी है ! और इसका प्रभाव बच्चों पर पड़ना निश्चित है ! बच्चे वही सीखते है जो उनके आस-पास घटित होता है ! और दहेज़ की लालसा भी सबसे ज्यादा सास को ही होती है यदि सास चाहे तो इस समस्या का निदान संभव है ! शेष समस्याएं इतनी विकराल नहीं है! उनका समाधान संभव है ! अतः इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं की नारी ही नारी की सबसे बड़ी शत्रु है !

के द्वारा: rajuahuja rajuahuja

पुनीता जी , मानसून को तो आना ही हैं ........क्यूंकि आपने इतने प्रेम से बुलाया हैं ..................................... मुझे अपने प्रिय कवि रामवृक्ष सिंह जी की एक कविता याद आ रही हैं .................................. घिर गई है पास शम ए दिल के आकर फिर उदासी आज बरसेगी घटा फिर औ रहेगी रूह प्यासी मिलन में उन्मत्त हो सीत्कार करती हैं बदलियाँ नारिकेलों को पवन के स्पर्श से है बदहवासी काँपते पीपल के पत्तों में सिहरता आर्द्र कागा बाज के भय से अभय पा गौर ने संकोच त्यागा झूमते बाँसों के झुरमुट लरजतीं तन्वी लताएं दादुरों में मेघ की आश्वस्ति से कंदर्प जागा चाँद की अभिलाष में नतशिर रहेगी आज नलिनी केलियों में कैद भँवरे को रखेगी फिर कमलिनी मेरे भीतर मेरे बाहर व्याप जाएगी दिशा सी वह तुम्हारी साँस दोलित उष्ण फागुन की हवासी चाँप देंगे चेतना को सर्द पवनों के थपेड़े घेर लेंगे आर्द्र पर्वत को कहीं बादल घनेरे स्वेद भीगे मुख अजानी रात जैसे मुस्कुराती वर्जती तम के प्रणय को तुम रहोगी दीपिका सी l

के द्वारा: ajaykr ajaykr

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

के द्वारा: Punita Jain Punita Jain

के द्वारा: punitajain punitajain




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